ख़्वाहिशें यूँ तो ज़िंदगी में कईं मुकम्मल हुईं
जो न हुईं उनके बस यहाँ पर अब निशान रहतें हैं
अब तो मेरे दिलों-दिमाग़ के किसी कमरे में बंद
मेरी चाहतें और कुछ अधूरे अरमाँ रहतें हैं
एक मुद्दत बीत गई है इन गलियों से गुज़रे हुए
वो ज़माना गया कि लगता था यहाँ अपने रहतें हैं
वाक़िफ़ तो बहुत हूँ मैं इस मकान से मगर
सुना है आजकल यहाँ कोई और साहब रहतें हैं
भला क्यों ढूँढता है अब भी तू हमदर्द यहाँ
वो तो अंजान हैं किस हाल में हम ज़िंदा रहतें हैं
एक ज़माने में इसकी पहचान होती हम से थी
सारे शहर को था मालूम ग़ाफ़िल कहाँ रहतें हैं