इश्क़ निकम्मा (Ishq Nikamma)
कौन ऐसा है जिसकी
कोई ख्वाहिश अधूरी न रही हो
क्या तुम जानते हो किसी को
जिसकी हर मुराद पूरी हुई हो
भला कौन मनाए
इस नादान दिल को
मोहब्बत जो समझ बैठा है हाय
शायद उनकी ज़रा सी हमदर्दी को
क्या मालूम उनकी गर्मजोशी
कब इश्क़ की गली में मुड़ जाए
थोड़ी मशक़्क़त तो लाज़मी है
जाने कब कहाँ उनका दीदार हो जाए
फ़िलहाल तो बस चढ़ा
उन से हुई एक मुलाक़ात सुरूर है
अगली बार कैसे किस तरह मिलें
हर पहर हर जून यही फ़ितूर है
जुनून-ए-उल्फ़त की भी
अजब दास्तान है ग़ाफ़िल
इसमें इंसान तो निकम्मा हो जाता है
लेकिन ये दिल बन जाता है क़ाबिलपहचान (Pehchaan)
ख़्वाहिशें यूँ तो ज़िंदगी में कईं मुकम्मल हुईं
जो न हुईं उनके बस यहाँ पर अब निशान रहतें हैं
अब तो मेरे दिलों-दिमाग़ के किसी कमरे में बंद
मेरी चाहतें और कुछ अधूरे अरमाँ रहतें हैं
एक मुद्दत बीत गई है इन गलियों से गुज़रे हुए
वो ज़माना गया कि लगता था यहाँ अपने रहतें हैं
वाक़िफ़ तो बहुत हूँ मैं इस मकान से मगर
सुना है आजकल यहाँ कोई और साहब रहतें हैं
भला क्यों ढूँढता है अब भी तू हमदर्द यहाँ
वो तो अंजान हैं किस हाल में हम ज़िंदा रहतें हैं
एक ज़माने में इसकी पहचान होती हम से थी
सारे शहर को था मालूम ग़ाफ़िल कहाँ रहतें हैंअंजाम-ए-उल्फ़त (Anjaam-e-Ulfat)
हर पहल का अंजाम हो ये ज़रूरी नहीं
हर सफ़र में साथ कारवां नहीं होता
मिलते हैं यूँ तो ज़िंदगी में कई रहगुज़र
मिले जिस राह मंजिल उसका निशान नहीं होता
चढ़ते हैं उसके सदके में रोज़ कई फ़ूल
फिर भी उसको लगता है एहतिराम नहीं होता
नसीब से मिलता है उसका फ़ज़्ल-ओ-करम
यूँ ही वो खुदा सब पे महरबां नहीं होता
अजीब उल्फ़त है तेरी भी ग़ाफ़िल
के उस पे मर के भी तू तमाम नहीं होता