अंजाम-ए-उल्फ़त (Anjaam-e-Ulfat)
हर पहल का अंजाम हो ये ज़रूरी नहीं
हर सफ़र में साथ कारवां नहीं होता
मिलते हैं यूँ तो ज़िंदगी में कई रहगुज़र
मिले जिस राह मंजिल उसका निशान नहीं होता
चढ़ते हैं उसके सदके में रोज़ कई फ़ूल
फिर भी उसको लगता है एहतिराम नहीं होता
नसीब से मिलता है उसका फ़ज़्ल-ओ-करम
यूँ ही वो खुदा सब पे महरबां नहीं होता
अजीब उल्फ़त है तेरी भी ग़ाफ़िल
के उस पे मर के भी तू तमाम नहीं होता