• Hindi Poetry | कविताएँ

    चेहरा (ज़िंदगी का)

    कहते हैं चेहरा रूह का आइना होता है
    आइना भी मगर कहाँ सारा सच बतलाता है 
    
    हँसते खिलखिलाते चेहरों के पीछे अक़सर
    झुर्रियों के बीच गहरे ज़ख़्म दबे होते हैं
    
    चाहे अनचाहे मुखौटे पहनना तो हम सीख लेतें हैं
    हक़ीक़त मगर अपनी गली ढूँढ ही लेती है
    
    लाख छुपाने की कोशिशों के बावजूद 
    शिकन आख़िर नज़र आ ही जाती है
    
    हम सब कोई ना कोई बोझ तो उठाए दबाए फिरते हैं
    बस कभी कह के तो कभी सह के सम्भाल लेते हैं
    
    ग़म और ख़ुशी तो सहेलियाँ हैं
    कब एक ने दूजी का हाथ छोड़ा है
    
    इन दोनों के रिश्ते में जलन कहीं तो पलती है
    ज़्यादा देर एक साथ दे किसी का तो दूसरी खलती है
    
    ज़िन्दगी है कैसे और कब तक एक ताल पे नाचेगी
    ग़म लगाम है तो ख़ुशी चाबुक
     फ़ितरतन वो भागेगी
    
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    फ़िलहाल

    Filhaal -Abstract  used for a poem of the same name by Sudham.
    कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है
     के ज़िंदगी के माइने बदल गए
     इतना बदला हुआ मेरा अक्स है
     लगता है जैसे आइने बदल गए
    
     अभी तो कारवाँ साथ था ज़िंदगी का
     जाने किस मोड़ रास्ते जुदा हो गए
     अब तो साथ है सिर्फ़ अपने साये का 
     जो थे सर पर कभी वो अचानक उठ गए
    
     यूँ लगता जैसे किसी नई दौड़ का हिस्सा हूँ
     किरदार कुछ नए कुछ जाने पहचाने रह गए
     शुरूवात वही पर अंत नहीं  एक नया सा क़िस्सा हूँ
     जोश भी है जुंबिश भी जाने क्यूँ मगर पैर थम गए
    
     एहसास एक भारी बोझ का है सर और काँधे पे भी
     पास दिखाई देते थे जो किनारे कभी वो छिप गए
     प्रबल धारा में अब नाव भी मैं हूँ और नाविक भी
     देखें अब आगे क्या हो अंजाम डूबे या तर गए
    
     इतने बदले हम से उसके अरमान हैं
     लगता है ज़िंदगी के पैमाने बदल गए
     कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है
     के ज़िंदगी के माइने बदल गए