• Hindi Poetry | कविताएँ

    चौथ का चाँद

    एक ऐसी ही चौथ की रात थी जब एक चाँद बादलों में छिप गया फिर लौट के वो दिन आ गया एक चौथ फिर से आ गयी फिर आँखें यूँ ही नम होंगी यादें फिर क़ाबू को तोड़ेंगी वक़्त थमता नहीं किसी के जाने से फिर भी कुछ लम्हे वहीं ठहर जातें हैं लाख़ आंसुओं के बह जाने पर भी कुछ मंज़र आँखों का घर बना लेते हैं यक़ीन बस यही है के एक दिन समय संग पीड़ ये भी कम होगी फ़िलहाल नैन ये भीगे विचरते हैं एक झपक में एक बरस यूँ बीत गया किसी दिवाली दीप फिर जलेंगे उन दियों में रोशन फिर ख़ुशियाँ होंगी छटेंगे बादल…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    भारत गणतंत्र

    मेरे देश का परचम आज लहरा तो रहा है लेकिन इर्द गिर्द घना कोहरा सा छा रहा है देश की हवाएं कुछ बदली सी हैं कभी गर्म कभी सर्द तो कभी सहमी सी हैं यूँ तो विश्व व्यवस्था में छोटी पर मेरा भारत जगमगा रहा है पर कहीं न कहीं सबका साथ सबका विकास के पथ पर डगमगा रहा है स्वेछा से खान पान और मनोरंजन का अधिकार कहीं ग़ुम हो गया है अब तो बच्चों का पाठशाला आना जाना भी खतरों से भरा है सहनशीलता मात्र एक विचार और चर्चा का विषय बन चला है गल्ली नुक्कड़ पर आज राष्ट्रवाद एक झंडे के नाम पर बिक रहा है क्या…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    ये जो देश है मेरा…

    कोई अच्छी खबर सुने तो मानो मुद्दत गुज़र गयी है लगता है सुर्खियां सुनाने वालों की तबियत कुछ बदल गयी है वहशियों और बुद्धीजीवियों में आजकल कुछ फरक दिखाई नहीं देता कोई इज़्ज़त लूट रहा है तो कोई इज़्ज़त लौटा रहा है बेवकूफियों को अनदेखा करने का रिवाज़ नामालूम कहाँ चला गया आलम ये है के समझदारों के घरों में बेवकूफों के नाम के क़सीदे पढ़े जा रहे हैं तालाब को गन्दा करने वाले लोग चंद ही हुआ करते हैं भले-बुरे, ज़रूरी और फज़ूल की समझ रखनेवाले को ही अकल्मन्द कहा करते हैं मौके के तवे पर खूब रोटियां सेंकी जा रहीं हैं कल के मशहूरों के अचानक उसूल जाग…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    ड़ोर

    उम्मीद की इक ड़ोर बांधे एक पतंग उड़ चली है कहते हैं लोग के अब की बार बदलाव की गर्म हवाएं पुरजोर चलीं हैं झूठ और हकीक़त का फैसला करने की तबीयत तो हर किसी में है कौन सच का है कातिल न-मालूम मुनसिब तो यहाँ सभी हैं सुर्र्खियों के पीछे भी एक नज़र लाज़िमी है गौर करें तो ड़ोर की दूसरी ओर हम सभी हैं अपने मुकद्दर के मालिक हम खुदी हैं

  • English Poetry

    The Semal and The Storks

    Each year come the Ides of March The Red Silk Cotton starts to bloom ‘Tis then that the waiting starts For the winged guests to arrive Somehow this cycle of nature Hast created for me a sense of normal Indicators that all’s well in the world The flocking birds and the blooming Semal This year too there was the anxious wait I wondered if, for the tree had bloomed late Woke up this morning and the cynic had died The flocking birds brought my hope alive

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    पहल

    खुद से कुछ कम नाराज़ रहने लगा हूँ   ऐब तो खूब गिन चुका खूबियाँ अपनी अब गिनने लगा हूँ मैं   आजकल एक नयी सी धुन में लगा हूँ अपने ख्यालों को अल्फाजों में बुनने लगा हूँ मैं   गैरों के नगमे गुनगुनाना छोड़ रहा हूँ अब बस अपने ही गीत लिखने चला हूँ मैं कुछ अपने से रंग तस्वीर में भरने लगा हूँ आम से अलग एक पहचान बनाने चला हूँ मैं   अंजाम से बेफिक्र एक पहल करने चला हूँ अपने अन्दर की आवाज़ को ही अपना खुदा मानने लगा हूँ मैं   खुद से कुछ कम नाराज़ रहने लगा हूँ

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    परिचय

    आज धूल चटी किताबों के बीच ज़िन्दगी का एक भूला पन्ना मिल गया धुँधले से लफ़्ज़ों के बीच पहचाना सा एक चहरा खिल गया अलफ़ाज़ पुराने यकायक जाग उठे मानो सार नया कोई मिल गया दो पंक्तियों के चंद लमहों में एक पूरा का पूरा युग बीत गया आज धूल चटी किताबों के बीच मुझ को मैं ही मिल गया

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    बटवारा

    मेरे देश का फिर बटवारा हो रहा है सैंतालीस में मुद्दा ज़मीन थी आज कल जंग है यकीन की इक अंधा सा जोश सर पानी हो चला है आज की अदालत प्रचार माध्यम हैं जूरी जन्ता और हर घर अदालत है अपने यकीं को लिए हर शक़्स कटघरे के दोनों तरफ खड़ा है आज़ादी बोलने की पुरज़ोर आज़मातें हैं शब्दों के वार का अजब सिलसिला है बोल-चाल में सब्र कहीं ग़ुम हो गया है दो बाटन के बीच मेरा मुल्क पिस रहा है ख़ेमे बटे हुए हैं रंगों के चहुँ ओर कहीं भगुआ तो कहीं हरे की लग रही है होड़ बिना मंज़िल की लगी दौड़ है मेरे देश का…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    नया साल

    कल की बीती को भुला दो अपने रूठों को आज मना लो इस बरस दिन तो फिर उतने ही होंगे मौक़े शायद फिर उतने न और मिलेंगे चलेगा जब नया साल दिन हफ़्ते महीनों की चाल कुछ पहचाने तो नए कुछ मिलेंगे रिश्तों के रास्ते लय होगी उनकी कभी मद्धम कभी तेज़ कभी आहिस्ते ये गोला तो सूरज की परिक्रमा फिर करेगा सर्द गरम और वर्षा का दौर यूँ चिरकाल चलेगा हर बदलता साल अपने संग रिश्तों का जश्न है लाता बिन साथियों के मने तो कहाँ कोई मज़ा है आता अनमोल हैं रिश्ते बस उन्ही को रखना है सम्भाल के कौन जाने साथ कितनों का और कितना और मिलेगा