Failure – Stepping Stone or Path to Condemnation
Reflections @ 50 plus
Bye-bye Birdie

The wheel of time has spun,
One of our brood has spread her wings and flown away.
A new chapter in life’s just begun.
She steps through the portals of her university and begins a new day.
It’s a strange sensation, a concoction of anxiety and apprehension.
There is also an overwhelming sense of joy that seems to pervade.
Protected and cared for all this while she encounters a new dimension.
Images of her first day at school keep getting played and replayed.
I remember the wide-open eyes, her as a newborn when I first held.
You’ve raised her well, Mama, know that she’ll quickly hit her stride.
I am beside myself seeing her turn into this woman who’s self-propelled.
It won’t be long before it’s her time to shine and you swell with pride.
And from here on, we all learn to live our lives anew.
As the older one finds herself, toughens up and gains knowledge.
We as parents fend and fight for one instead of two.
Students once again, learning lessons from life -the eternal college.तारे (Taare)

इस शहर में अब सितारे नहीं नज़र आते
बादलों में लुका-छुपी खेलते तारे नहीं टिमटिमाते
तरक्की बहुत कर ली है अब इस शहर ने
आसमान ही निगल लिया है इसकी चकाचौंध ने
ज़िंदगी की भी अब अपनी ही मसरूफ़ियत है
एक अजीब सी घुटन और बिगड़ी तबीयत है
मन भर सा गया है इन रोज़ तंग होती गलियों से
सब निशान ग़ायब हो रहे हैं यहाँ की तस्वीरों से
एक अरसे से उधेड़-बुन में लगा रहता हूँ
रोज़ एक नया शहर एक नया जहाँ बसा लेता हूँ
साँस लेता हूँ खुल के मैं उसकी साफ़ हवा में
साँझ ढले तारे ही तारे भर जातें हैं आसमान में
शायद मेरी ही उम्र का एक दौर चला है नया
ये शहर आगे बढ़ रहा है और मैं वहीं थम गया
रिश्ते और यादें यहाँ जड़ें कर चुकीं हैं गहरी
कैसे पाऊँ चैन कहीं और फ़ितरत ही है शहरीख़ामोशी (Khamoshi)

ख़ामोशी के खालीपन में
मैंने ख़ुद को खो दिया
तेरे इश्क़ के पागलपन में
अपनी हस्ती को ही डुबो दिया
तेरी यादों की बेइन्तहाई में
दिन और रैन की सुद को छोड़ दिया
बिछोड़े की इस तन्हाई में
मैंने अपनों से रिश्ता तोड़ दिया
तेरी बेवफ़ाई की इन बातों में
जाने कैसे ग़म से नाता जोड़ दिया
सजदे किये थे जिस रब की ख़ुदाई में
उसी ख़ुदा ने अपना रुख मोड़ दियाझलक (Jhalak)

देखते देखते पूरा एक साल बीत गया
श्रृष्टि के नियमानुसार फ़िर काल जीत गया
जीवन है, लगी तो रहती ही है आनी जानी
इस ताल को वश में कर पाया नहीं कोई ज्ञानी
समय और संवेदना हृदय की पीड़ा हर नहीं पाते
कुछ रिश्ते किसी भी जतन भुलाए नहीं भुलाते
साये जो हट जातें हैं बड़ों के कभी सिर से
लाख चाहे किसी के मिल नहीं पाते फ़िर से
जीवन का चक्का तो निरंतर घूमता ही रहता है
हर पल हर दिन एक नई कहानी गढ़ देता है
पात्र बदल जातें हैं कुछ, कुछ बदले आतें हैं नज़र
मोह का भी क्या है नया बना लेता है अपना घर
दौड़ती फिरती है ये यादें मगर कुछ बेलगाम सी
बातों और आदतों में ढूँढ लेती हैं झलक उनकी
बीते दिनों के किस्सों से अपना मन भर लेता हूँ
मन हो भारी तो उनको बंद आँखों में भर लेता हूँचिट्ठी (Chitthi)

मैं ख़ुश हूँ पापा
और मुझे मालूम है
के इस बात को जान
आप कई ज़्यादा ख़ुश होते
बीते चार सालों में
कुछ पाया और
बहुत कुछ खोया है
“जीवन है”, आप यही कहते
बड़ी वाली की बातों
छोटी की आदतों
आपकी बहू के अक्खड़पन में भी
आप मुझे नज़र आते हो
हर रोज़ मैं अपने आप को
आपके जैसे किसी साँचे में
ढालने की हिम्मत जुटाता हूँ
कुछ देर के लिए आप बन जाता हूँ
बातें तो बहुत और भी थीं
जो बताने सुनाने की सोची थी
आप पास ही हो कहीं शायद
क्योंकि इस ख़याल से अब भी सहम जाता हूँजो तुम होतीं (Jo Tum Hoti)
अरसे से दिल कुछ भारी सा है
एक ख़याल दिमाग़ पे हावी सा है
माँ आज जो तुम दुनिया में होतीं
तो पूरे अस्सी साल की हो जातीं
तुम्हारे ना होने की आदत ही नहीं डल रही
इतनी यादें हैं तुम्हारी जो धुंधली नहीं पड़ रहीं
हर सुबह की वो नोंक-झोंक के चाय कौन बनाएगा
या इस बात पे बहस की क्या कभी देश में
राम राज्य आयेगा
कईं और भी मनसूबे किए थे जो बिखरे पड़े हैं
ख़त्म होने चलें हैं आँसू मेरे, नैनों में सूखे पड़ें हैं
इस बरस cake की मोमबत्ती नहीं तेरी याद में दिया जलेगा
वक्त को अब धीरे धीरे मेरा ये ज़ख़्म भी भरना पड़ेगाआज (Aaj)

मेरे जज़्बात कुछ उलझे उलझे से हैं
मेरे हालात कुछ बदले बदले से हैं
जिस कलम की नोक से अल्फ़ाज़ बहते थे
आज उसके नीचे काग़ज़ कोरे कोरे पड़े हैं
ज़िन्दगी और जीने के मायने अलग हो चले हैं
पीरी के साथ ख़यालात अब कुछ सुलझ गए हैं
जो कभी रातों का सवेरा रोज़ किया करते थे
आज वो चंद पलों की फुर्सत से कतरा रहें हैं
मंज़िल और पड़ाव का फ़र्क़ धुंधला रहा है
सफ़र शायद अपने अंजाम तक आ रहा है
ये चश्म जो कभी साथी ढूँढते थे
आज वो साथ छूटने से घबरा रहें हैं
अब तो इंतज़ार ही मकसद बन चुका है
हर लम्हा अगले लम्हे के लिए बीत रहा है
जो कभी कल की फ़िक्र को धुएँ में उड़ाते थे
आज वो आने वाले कल को देख पा रहें हैंरोज़ाना (Rozaana)

आसान नहीं है ऐसा हो जाना
होता भी तो नहीं है ऐसा रोज़ाना
मिले, बैठे, फिर अपनी राह चले
इस से ज़्यादा कौन करता है भले
बात ये कुछ तीस बरस पुरानी है
चंद दोस्तों की ये अजब कहानी है
अलग भाव, अलग स्वभाव का व्यवहार था
आपस में यूँ घुल जाना अनूठा विचार था
लड़कपन की सूखी लकड़ियाँ तैयार थी
बस एक अल्लढ़ चिंगारी की दरकार थी
एक हॉस्टल के कमरे की ये दास्ताँ है
गहरी नींव पे खड़ा ये यारी का मकान है
कभी बिछड़े, कही झगड़े, कभी बस पड़े पड़े
कितने दिन ढले, रातें बीतें, कितने सूरज चढ़े
ज़िंदगी के कदम मीलों में कब कैसे बदल गए
बाल में सफ़ेद और वज़न सालों संग बढ़ गए
दूरी जो थी यारी को सिमटा मिटा ना सकी
नोक झोंक, छेड़ छाड़ की आग बुझी न रुकी
जीवन के कई उतार-चढ़ाव दोस्तों ने देखें हैं
साथ खड़े रहने, निभाने के क़िस्से अनोखे हैं
हर गुट, हर कहानी में कई किरदार होतें हैं
किसी सूरत में सेना, किसी में सरदार होते हैं
जो ना देखे ऊँच-नीच ना देखे दुनियादारी
कुछ ऐसी और लंबी चली है ये गाड़ी हमारी
अब तक सँभाली है बस यूँ ही चलानी है
बावजूद दूरी या मजबूरी पूरी निभानी है
क्यों की आसान नहीं है ऐसा हो जाना
और होता भी तो नहीं है ऐसा रोज़ाना