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    तलाश (Talaash)

    मुझे मिल तो रहीं थी 
    जिसकी कभी न कोई आस थी
    शायद वो ख़ुशी अलग थी
    जिसकी मुझे तलाश थी

    उसकी नैमतों से कितना अनजान था
    मेरा तो बस अपनी चाहतों पे ध्यान था
    मेरी ज़िद से भी बड़ा मेरा एक अरमान था
    ज़मीन की क़द्र न की के ऊपर आसमान था

    उम्र मेरी अब जो धीरे धीरे ढलने लगी है
    हसरतों की आग अब मद्धम होने लगी है
    जो है हासिल उसकी अहमियत दिखने लगी है
    एक नयी सी लौ अब मुझ में जलने लगी है

    मंज़िल का नहीं अब सफ़र का इंतज़ार करता हूँ
    अपना तो कर चुका अपनों का ख़्याल करता हूँ
    सपनों में जो भरने है रंग उनको तैयार करता हूँ
    ज़िंदा रहने से नहीं ज़िंदगी से प्यार करता हूँ