• Hindi Poetry | कविताएँ

    बैरी रंग (Bairi Rang)

    ये रंग मुझे अब चुभते हैं 
    मुझको ये बैरी लगते हैं

    जाने कब मन ये ऊब गया
    जो था उत्साह वो डूब गया

    नामालूम कब क्या बात हुई
    क्यों छटा से जो थी वो आस गई

    कुछ अनजानी ये घबराहट है
    मन विचलित है छटपटाहट है

    अब मिलने में वो कुशाद नहीं
    गुजिये में वो अब स्वाद नहीं

    कुछ अपनों का अब साथ ना रहा
    इस पर्व का कोई उमंग नाथ ना रहा

    मुझको ये बैरी लगते हैं
    ये रंग मुझे अब चुभते हैं