• Hindi Poetry | कविताएँ

    तारे (Taare)

    इस शहर में अब सितारे नहीं नज़र आते 
    बादलों में लुका-छुपी खेलते तारे नहीं टिमटिमाते
    तरक्की बहुत कर ली है अब इस शहर ने
    आसमान ही निगल लिया है इसकी चकाचौंध ने

    ज़िंदगी की भी अब अपनी ही मसरूफ़ियत है
    एक अजीब सी घुटन और बिगड़ी तबीयत है
    मन भर सा गया है इन रोज़ तंग होती गलियों से
    सब निशान ग़ायब हो रहे हैं यहाँ की तस्वीरों से

    एक अरसे से उधेड़-बुन में लगा रहता हूँ
    रोज़ एक नया शहर एक नया जहाँ बसा लेता हूँ
    साँस लेता हूँ खुल के मैं उसकी साफ़ हवा में
    साँझ ढले तारे ही तारे भर जातें हैं आसमान में

    शायद मेरी ही उम्र का एक दौर चला है नया
    ये शहर आगे बढ़ रहा है और मैं वहीं थम गया
    रिश्ते और यादें यहाँ जड़ें कर चुकीं हैं गहरी
    कैसे पाऊँ चैन कहीं और फ़ितरत ही है शहरी