उम्मीद (Ummeed)

उम्मीद भी बड़ी ज़ालिम होती है
ख़ुद से ही कर बैठो अगर
वो ज़माने के कहने से नहीं
आईने की मज़ालिम होती है
अपने अक्स की तंज़ पे
झाँका था गिरेबाँ में एक मर्तबा
मेरे उसूल वहाँ भी तन्हा थे खड़े
गुमाँ फ़िर भी करता रहा अपनी नेकी पे
मैं तो बस करता रहा अपने दिल की कही
मुश्किलें जो पेश आई मैं चलता रहा मुसलसल
हावी होने न दिया नाकामियों को कभी
मेरा ज़मीर मेरा रहनुमा है जो सच है वही है सही