कौन ऐसा है जिसकी
कोई ख्वाहिश अधूरी न रही हो
क्या तुम जानते हो किसी को
जिसकी हर मुराद पूरी हुई हो
भला कौन मनाए
इस नादान दिल को
मोहब्बत जो समझ बैठा है हाय
शायद उनकी ज़रा सी हमदर्दी को
क्या मालूम उनकी गर्मजोशी
कब इश्क़ की गली में मुड़ जाए
थोड़ी मशक़्क़त तो लाज़मी है
जाने कब कहाँ उनका दीदार हो जाए
फ़िलहाल तो बस चढ़ा
उन से हुई एक मुलाक़ात सुरूर है
अगली बार कैसे किस तरह मिलें
हर पहर हर जून यही फ़ितूर है
जुनून-ए-उल्फ़त की भी
अजब दास्तान है ग़ाफ़िल
इसमें इंसान तो निकम्मा हो जाता है
लेकिन ये दिल बन जाता है क़ाबिल