Hindi Poetry | कविताएँ
पढ़ें सुधाम द्वारा लिखी कविताएँ। सुधाम के लेखन में श्रृंगार, करुणा, अधभुत आदि रसों का स्वाद सम्मिलित है।
अनकही
मैंने अनकही सुनी है सुनी है मैंने वो सारी बातें जो किसी ने मुझसे न कही है सहमी हुई धडकनों की आवाज़ छपक्ति पलकों के अंदाज़ तेज़ दौड़ती साँसों की हर बात इन सब में छुपे वो सारे राज़ हाँ मैंने अनकही सुनी है मुस्कुराहटों के तले दबी तड़पन बदलते सुलघते रिश्तों में पड़ती अड़चन बर्बादी की ओर बढ़ते कदम अंजाम से अनजान बेपरवाह उन सभी समझौतों को हाँ मैंने अनकही सुनी है ऊँची उड़ानों में डूबते अरमानों को बुरे वक़्त में बदलते इंसानों को दोस्ती में पड़ती दरारों का आगाज़ टूटे दिल में थमती हरकत मासूम आँखों ने जो पूछे तमाम उन सभी सवालों को हाँ मैंने अनकही सुनी है सुनी है मैंने वोह सारी बातें जो किसी ने मुझसे न कही है
Listen to the recitation उलफ़त
उनकी उलफ़त का ये आलम है
के कोरे कागज़ पे भी ख़त पढ़ लिया करतें हैं
ज़िन्दगी ऐसी गुलिस्तां बन गयी उनके प्यार में
के कागज़ के फूलों में ख़ुशबू ढूँढ लिया करतें हैं
हम तो फिर भी आशिक़ हैं
मानने वाले तो पत्थर में ख़ुदा को ढूँढ लिया करतें हैंदिवाली

इस बरस दिवाली के दियों संग कुछ ख़त भी जल गये कुछ यादों की लौ कम हुई कुछ रिश्ते बुझ गये भूले बंधनों के चिरागों तले अँधेरे जो थे वो मिट गये बनके बाती जब जले वो रैन भर सारे शिकवे जो थे संग ख़ाक हो गये
यारी

यादों के लम्बे पाँव अकसर रात की चादर के बाहर पसर जातें हैं आवारा, बेखौफ़ ये हाल में माज़ी को तलाशा लिया करतें हैं ख्वाबों में आने वाले खुली आँखों में समाने लगतें हैं फिर एक बार बातों के सिलसिले वक्त से बेपरवाह चलतें हैं वो नादान इश्क की दास्तानें वो बेगरज़ यारियाँ समाँ कुछ अलग ही बँधता है जब बिछडे दोस्त मिला करतें हैं यादों के लम्बे पाँव अकसर रात की चादर के बाहर पसर जातें हैं
क्यों

कितने आंसू अब और बहेंगे कितने ज़ुल्म यूँ और सहेंगे वक़्त का एक लम्हा तो इस ख़ौफ से सहमा होगा ऐसी वहशत को इबादत समझे जो शायद ही कोई ख़ुदा होगा कितने आंसू अब और बहेंगे कितने ज़ुल्म यूँ और सहेंगे ऐसे ज़ख्मों का मलहम कहीं तो मिलता होगा कहीं किसी सीने में तो दिल धड़कता होगा अब न आंसूं और बहे ये अब न ज़ुल्म यूँ और सहें हम सब को अब कुछ करना होगा सब से पहले ख़ुद को फिर ऐसी ख़ुदाई को बदलना होगा
ये जो है ज़िन्दगी…
आजकल कुछ बदल सी गयी है ज़िन्दगी चलती तो है मगर कुछ थम सी गयी है ज़िन्दगी मानो मुट्ठी में सिमट ही गयी है ज़िन्दगी साढ़े पांच इंच के स्क्रीन में कट रही है ज़िन्दगी इंसानों से स्मार्ट फोनों में बढ़ती भीड़ के तन्हा कोनों में लोगो की बंद ज़ुबानों में कच्चे या पक्के मकानों में बस अब अकेले मुस्कुराने का नाम है ज़िन्दगी संग हमसफ़र के एकाकी बीतने का नाम है ज़िन्दगी आजकल कुछ बदल सी गयी है ज़िन्दगी चलती तो है मगर कुछ थम सी गयी है ज़िन्दगी आजकल बच्चे पड़ोस की घंटी नहीं बजाते गुस्सैल गुप्ता जी का शीशा फोड़ भाग नहीं जाते स्कूल बस के स्टॉप पे खड़ी मम्मियाँ आपस में नहीं बतियाते दफ्तर से लौट दिन भर की खबर मांगने वाले वो पापा नहीं आते अब फेसबुक पे लाइक और चैट-ग्रुप में क्लैप करने का ढंग है ज़िन्दगी फुल एचडी विविड कलर में भी बेरंग हो चली है ज़िन्दगी आजकल कुछ बदल सी गयी है ज़िन्दगी चलती तो है मगर कुछ थम सी गयी है ज़िन्दगी
एक शहर था…

एक शहर था प्यारा फ़ूलों का महका करती थी हर गली जिसकी दिल दरिया हुआ करता था उसके लोगों का समाते थे जिस में विभिन्न जाति प्रांत के लोग सभी फिरते थे जब गली बाज़ारों में अनेकों बोलियां श्रवण में आती थी पोंगल दशहरा हब्बा ईद त्योहारों पर गलियां एक सी सजती थी फिर एक दिन सब कुछ बदल गया सिक्का मतलबपरस्ती का मानो ऐसा चल गया काम छोड़कर नामों मे पहचान हर किसी की ढूंढी गई पानी ने आग लगा डाली पहले जो बुझाया करती थी जल रहा वो शहर फूलों का दहक रही हैं गलियां अब उसकी तांडव हिंसा का चल रहा कौन सुन रहा गुहार उसकी
तू है

मेरी आदतों में मेरी ज़रूरतों में मेरे दर्द में मेरी ख़ुशियों में मेरी शामों में मेरी हर सुबह में हर रोज़ के हर पल में मेरे होने में और न होने में हर सूरत हर हाल में बढ़ती थमती साँसों में गुज़रते वक़्त की चाल में मंदिर गिरजा की घंटियों में शबद में आयतों में लक्ष्मी दुर्गा सरस्वती में बेटी माँ सखी और संगिनी में तू है तो हूँ मैं तू है तो हूँ मैं
आज… कल…

मेरा आज जाने क्यों मेरे कल से रूठा है पल पल कुढ़ता है उसे सोच के जो बीता है नाराज़गी इस क़दर है की कहता है कल झूठा है कैसे बतलाऊँ की हर आज बीते कल में भी जीता है सपने तो बहुत देखें थे आज के लिए मेरे कल ने अरमान भी बड़े बड़े सजाए थे मुस्तकबिल के कितनी शिद्दत भरी थी कल की हर एक दुआ में महनत भी शामिल थी जिसके की कल काबिल थे पर मेरे आज को तो अपनी हक़ीक़त से मतलब है जो सच हुआ, हो पाया, बस वही तो आज और अब है हसरतें लेकिन मेरे आज की भी कम नहीं, बहुत हैं कुछ ज़्यादा, कुछ बेहतर, कुछ बढ़कर मेरे आज की तलब है क्यों मेरा आज बीते अपने ही कल को नहीं पहचानता क्यों वो अपना समझ के मेरे कल का हाथ नहीं थामता आनेवाली सुबह में खुद गुल हो जाएगा क्यों नहीं मानता वो भी किसी आज का कल होगा क्या ये नहीं जानता भला सोचो सब जान के भी यूँ अनजान बना क्यों मेरा आज पड़ा है किस लिए आज ज़िद्द पकड़े अपनी बात पे ही ऐसे अड़ा है पहला तो नहीं है शायद मेरा ये आज जो अपने कल से लड़ा है एक बीत गया, एक आया नहीं, बस यही आज है जो वास्तव में खड़ा है
आशाएँ

लो आ गया जन्मदिन, आ गयी फिर एक सालगिरह हम इस गोले संग एक सौर्य परिक्रमा और कर आए कुछ साल पहले तक तो थे काले घने अब तो दाढ़ी के बाल भी पकने को आए उम्मीदें जो बचपन ने जवानी से की थी कुछ भूल ही गए, कुछ सच हुईं, कुछ निभी न निभाए दौर तो अच्छे बुरे जैसे तैसे सारे ही बीत गये हासिल तो वो है जो दोस्त सदा संग पाए आशाएँ जीवन से आज भी हैं समय अब चाहे जितना हो ज़रूरी ये नहीं के सारी पूर्ण हों, बस कोई कोशिश अधूरी न रह जाए