Hindi Poetry | कविताएँ

पढ़ें सुधाम द्वारा लिखी कविताएँ। सुधाम के लेखन में श्रृंगार, करुणा, अधभुत आदि रसों का स्वाद सम्मिलित है।

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    Tijori (तिजोरी)

    लम्हा लम्हा बीत रही है ज़िंदगी जीवन की अपनी ही एक ताल है वक्त की किसी से नहीं है बंदगी हाल-ए-जहाँ से बेवास्ता चाल है बचपन जवानी की चोटियाँ पीछे कहीं दूर छूठ गयीं ये अधेड़ उम्र की है वादियाँ बहती दरिया है, मोड़ आगे हैं कयीं कैसे ठहरें बस जायें किसी एक लम्हे में हम बिखरे पड़े हैं यादों के ढेरों मोती चमक है कुछ में और कुछ में है कम किसी लम्हे में सुबह, किसी में शाम नहीं होती भर तो ली है हमने यादों से तिजोरी वक्त के कहाँ हुए हम धनी हैं बाज़ार में माज़ी की क़ीमत है थोड़ी क्या मालूम बस सही परख़ की कमी…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    चेहरा (ज़िंदगी का)

    कहते हैं चेहरा रूह का आइना होता है आइना भी मगर कहाँ सारा सच बतलाता है हँसते खिलखिलाते चेहरों के पीछे अक़सर झुर्रियों के बीच गहरे ज़ख़्म दबे होते हैं चाहे अनचाहे मुखौटे पहनना तो हम सीख लेतें हैं हक़ीक़त मगर अपनी गली ढूँढ ही लेती है लाख छुपाने की कोशिशों के बावजूद शिकन आख़िर नज़र आ ही जाती है हम सब कोई ना कोई बोझ तो उठाए दबाए फिरते हैं बस कभी कह के तो कभी सह के सम्भाल लेते हैं ग़म और ख़ुशी तो सहेलियाँ हैं कब एक ने दूजी का हाथ छोड़ा है इन दोनों के रिश्ते में जलन कहीं तो पलती है ज़्यादा देर एक साथ…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    दंगल

    वाक़िफ हैं तेरे हथकंडो से ए ज़िंदगी फ़िर भी उलझन पैदा कर ही देती हो लाख़ जतन सम्भालने के करते हैं मगर बख़ूब धोबी पच्छाड़ लगा पटक ही देती हो थेथर मगर हम भी कम कहाँ दंगल में तेरी उठ के फ़िर कूद जातें हैं थके पिटे कितने ही हो भला ख़ुद पे एक बार और दाव लगाते हैं तुम्हारे अखाड़े की लगी मिट्टी नहीं छूटती बहुत चाट ली ज़मीन की धूल गिर गिर कर ये विजय नहीं स्वाभिमान की ज़िद्द है जो लक्ष्य नहीं चूकती अब निकलेंगे अपनी पीठ पे या बाज़ी जीत कर

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    चौथ का चाँद

    एक ऐसी ही चौथ की रात थी जब एक चाँद बादलों में छिप गया फिर लौट के वो दिन आ गया एक चौथ फिर से आ गयी फिर आँखें यूँ ही नम होंगी यादें फिर क़ाबू को तोड़ेंगी वक़्त थमता नहीं किसी के जाने से फिर भी कुछ लम्हे वहीं ठहर जातें हैं लाख़ आंसुओं के बह जाने पर भी कुछ मंज़र आँखों का घर बना लेते हैं यक़ीन बस यही है के एक दिन समय संग पीड़ ये भी कम होगी फ़िलहाल नैन ये भीगे विचरते हैं एक झपक में एक बरस यूँ बीत गया किसी दिवाली दीप फिर जलेंगे उन दियों में रोशन फिर ख़ुशियाँ होंगी छटेंगे बादल…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    तू है…के नहीं?

    आज एक याद फ़िर ताज़ा हो चली है संग वो अपने सौ बातें और हज़ार एहसास ले चली है तोड़ वक़्त के तैखाने की ज़ंजीरें खुली आँखों में टंग गयी बीते पलों में बसी तस्वीरें सुनाई साफ़ देती है हर बात अफ़सानों का ज़ायका और निखर गया है सालों के साथ दर्द और ख़ुशी का अजब ये मेल है संग हो तुम फिर भी नहीं हो बस यही क़िस्मत का खेल है

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    फ़िलहाल

    कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है के ज़िंदगी के माइने बदल गए इतना बदला हुआ मेरा अक्स है लगता है जैसे आइने बदल गए अभी तो कारवाँ साथ था ज़िंदगी का जाने किस मोड़ रास्ते जुदा हो गए अब तो साथ है सिर्फ़ अपने साये का जो थे सर पर कभी वो अचानक उठ गए यूँ लगता जैसे किसी नई दौड़ का हिस्सा हूँ किरदार कुछ नए कुछ जाने पहचाने रह गए शुरूवात वही पर अंत नहीं एक नया सा क़िस्सा हूँ जोश भी है जुंबिश भी जाने क्यूँ मगर पैर थम गए एहसास एक भारी बोझ का है सर और काँधे पे भी पास दिखाई देते थे जो…

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    किसे पता था

    किसे पता था के एक दिन ये चेहरा मुझ से यूँ जुड़ जायेगा अपरिचित अनजान वो मेरी पहचान बन जायेगा किसे पता था ये मौक़ा भी आयेगा परिचय कोई कारवायेगा पहचाने उस चेहरे को एक नाम वो दिलायेगा किसे पता था जान पहचान एक दिन दोस्ती भी बन जायेगी पटरियाँ साथ साथ चलते इतनी दूर आ जायेंगी किसे पता था रेल के उन डिब्बों में बैठ आते जाते बतियाते दिलों की डोर यूँ बंध जायेगी किसे पता था सात क़दम चल सात वचन ले कर हमसफ़र जीवन के हम दोनों बन जायेंगे किसे पता था

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    ड़ोर

    उम्मीद की इक ड़ोर बांधे एक पतंग उड़ चली है कहते हैं लोग के अब की बार बदलाव की गर्म हवाएं पुरजोर चलीं हैं झूठ और हकीक़त का फैसला करने की तबीयत तो हर किसी में है कौन सच का है कातिल न-मालूम मुनसिब तो यहाँ सभी हैं सुर्र्खियों के पीछे भी एक नज़र लाज़िमी है गौर करें तो ड़ोर की दूसरी ओर हम सभी हैं अपने मुकद्दर के मालिक हम खुदी हैं

  • Hindi Poetry | कविताएँ

    भारत गणतंत्र

    मेरे देश का परचम आज लहरा तो रहा है लेकिन इर्द गिर्द घना कोहरा सा छा रहा है देश की हवाएं कुछ बदली सी हैं कभी गर्म कभी सर्द तो कभी सहमी सी हैं यूँ तो विश्व व्यवस्था में छोटी पर मेरा भारत जगमगा रहा है पर कहीं न कहीं सबका साथ सबका विकास के पथ पर डगमगा रहा है स्वेछा से खान पान और मनोरंजन का अधिकार कहीं ग़ुम हो गया है अब तो बच्चों का पाठशाला आना जाना भी खतरों से भरा है सहनशीलता मात्र एक विचार और चर्चा का विषय बन चला है गल्ली नुक्कड़ पर आज राष्ट्रवाद एक झंडे के नाम पर बिक रहा है क्या…