Hindi Poetry | कविताएँ
पढ़ें सुधाम द्वारा लिखी कविताएँ। सुधाम के लेखन में श्रृंगार, करुणा, अधभुत आदि रसों का स्वाद सम्मिलित है।
पहचान (Pehchaan)
ख़्वाहिशें यूँ तो ज़िंदगी में कईं मुकम्मल हुईं
जो न हुईं उनके बस यहाँ पर अब निशान रहतें हैं
अब तो मेरे दिलों-दिमाग़ के किसी कमरे में बंद
मेरी चाहतें और कुछ अधूरे अरमाँ रहतें हैं
एक मुद्दत बीत गई है इन गलियों से गुज़रे हुए
वो ज़माना गया कि लगता था यहाँ अपने रहतें हैं
वाक़िफ़ तो बहुत हूँ मैं इस मकान से मगर
सुना है आजकल यहाँ कोई और साहब रहतें हैं
भला क्यों ढूँढता है अब भी तू हमदर्द यहाँ
वो तो अंजान हैं किस हाल में हम ज़िंदा रहतें हैं
एक ज़माने में इसकी पहचान होती हम से थी
सारे शहर को था मालूम ग़ाफ़िल कहाँ रहतें हैंअंजाम-ए-उल्फ़त (Anjaam-e-Ulfat)
हर पहल का अंजाम हो ये ज़रूरी नहीं
हर सफ़र में साथ कारवां नहीं होता
मिलते हैं यूँ तो ज़िंदगी में कई रहगुज़र
मिले जिस राह मंजिल उसका निशान नहीं होता
चढ़ते हैं उसके सदके में रोज़ कई फ़ूल
फिर भी उसको लगता है एहतिराम नहीं होता
नसीब से मिलता है उसका फ़ज़्ल-ओ-करम
यूँ ही वो खुदा सब पे महरबां नहीं होता
अजीब उल्फ़त है तेरी भी ग़ाफ़िल
के उस पे मर के भी तू तमाम नहीं होताउम्मीद (Ummeed)

उम्मीद भी बड़ी ज़ालिम होती है
ख़ुद से ही कर बैठो अगर
वो ज़माने के कहने से नहीं
आईने की मज़ालिम होती है
अपने अक्स की तंज़ पे
झाँका था गिरेबाँ में एक मर्तबा
मेरे उसूल वहाँ भी तन्हा थे खड़े
गुमाँ फ़िर भी करता रहा अपनी नेकी पे
मैं तो बस करता रहा अपने दिल की कही
मुश्किलें जो पेश आई मैं चलता रहा मुसलसल
हावी होने न दिया नाकामियों को कभी
मेरा ज़मीर मेरा रहनुमा है जो सच है वही है सहीतारे (Taare)

इस शहर में अब सितारे नहीं नज़र आते
बादलों में लुका-छुपी खेलते तारे नहीं टिमटिमाते
तरक्की बहुत कर ली है अब इस शहर ने
आसमान ही निगल लिया है इसकी चकाचौंध ने
ज़िंदगी की भी अब अपनी ही मसरूफ़ियत है
एक अजीब सी घुटन और बिगड़ी तबीयत है
मन भर सा गया है इन रोज़ तंग होती गलियों से
सब निशान ग़ायब हो रहे हैं यहाँ की तस्वीरों से
एक अरसे से उधेड़-बुन में लगा रहता हूँ
रोज़ एक नया शहर एक नया जहाँ बसा लेता हूँ
साँस लेता हूँ खुल के मैं उसकी साफ़ हवा में
साँझ ढले तारे ही तारे भर जातें हैं आसमान में
शायद मेरी ही उम्र का एक दौर चला है नया
ये शहर आगे बढ़ रहा है और मैं वहीं थम गया
रिश्ते और यादें यहाँ जड़ें कर चुकीं हैं गहरी
कैसे पाऊँ चैन कहीं और फ़ितरत ही है शहरीकल का सूरज (Kal ka Sooraj)

एक बात तो खिली धूप सी
उजली और साफ़ हो चली है
मेरी हस्ती बीते कल में ज़्यादा
और आने वाले में कम मिली है
मेरे कल और मेरे आज के सूरज में
मेरा हिस्सा कुछ माँगा कुछ अपने दम का होगा
जो उगने वाला है कल सूरज वो
अतीत का नम और भविष्य का तेज़ सूचक होगा
जो आज विशेषण मेरे लिए उपयुक्त हो रहे हैं
उनमें से कुछ मेरे पितृ तात के साथ भी जुड़े होंगे
परिवर्तन का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है
इस भाग की नायिका और पात्र सब नए होंगे
हर पल समय अवश्य बदलता रहता है लेकिन
दिन रैन और ऋतु चिरकाल और निरंतर हैं
यूँ देखो तो ढलते और उगते सूरज के बीच
बस एक रात और एक दृष्टिकोण का अंतर हैपहलगाम (Pahalgam)

एक लम्हा ही काफ़ी है
जन्नत को दोज़ख़ बनाने के लिए
इंसानियत को मरना पड़ता है
इंसान को मारने के लिए
हद और सरहद दोनों बेमानी हैं
नफ़रत को घर करने के लिए
असली कातिल तो ये सियासत है
बेगुनाह क़ुर्बान किए जाते हैं जिसके लिए
क्या ज़िंदगी का मिटाना ज़रूरी है
नुक्ता-ए-नज़र को आगे रखने के लिए
क्या इतनी हैवानियत लाज़िम है
किसी भी ख़ुदा की बंदगी के लिए
अरसों के बाद मुश्किल से गुल खिले हैं
मरहम से लगने लगे थे ज़ख़्मों के लिए
जाने कितने और फ़ासले अब भी हैं
बर-रू-ए-ज़मीं फ़िरदौस के लिएख़ामोशी (Khamoshi)

ख़ामोशी के खालीपन में
मैंने ख़ुद को खो दिया
तेरे इश्क़ के पागलपन में
अपनी हस्ती को ही डुबो दिया
तेरी यादों की बेइन्तहाई में
दिन और रैन की सुद को छोड़ दिया
बिछोड़े की इस तन्हाई में
मैंने अपनों से रिश्ता तोड़ दिया
तेरी बेवफ़ाई की इन बातों में
जाने कैसे ग़म से नाता जोड़ दिया
सजदे किये थे जिस रब की ख़ुदाई में
उसी ख़ुदा ने अपना रुख मोड़ दियाझलक (Jhalak)

देखते देखते पूरा एक साल बीत गया
श्रृष्टि के नियमानुसार फ़िर काल जीत गया
जीवन है, लगी तो रहती ही है आनी जानी
इस ताल को वश में कर पाया नहीं कोई ज्ञानी
समय और संवेदना हृदय की पीड़ा हर नहीं पाते
कुछ रिश्ते किसी भी जतन भुलाए नहीं भुलाते
साये जो हट जातें हैं बड़ों के कभी सिर से
लाख चाहे किसी के मिल नहीं पाते फ़िर से
जीवन का चक्का तो निरंतर घूमता ही रहता है
हर पल हर दिन एक नई कहानी गढ़ देता है
पात्र बदल जातें हैं कुछ, कुछ बदले आतें हैं नज़र
मोह का भी क्या है नया बना लेता है अपना घर
दौड़ती फिरती है ये यादें मगर कुछ बेलगाम सी
बातों और आदतों में ढूँढ लेती हैं झलक उनकी
बीते दिनों के किस्सों से अपना मन भर लेता हूँ
मन हो भारी तो उनको बंद आँखों में भर लेता हूँचिट्ठी (Chitthi)

मैं ख़ुश हूँ पापा
और मुझे मालूम है
के इस बात को जान
आप कई ज़्यादा ख़ुश होते
बीते चार सालों में
कुछ पाया और
बहुत कुछ खोया है
“जीवन है”, आप यही कहते
बड़ी वाली की बातों
छोटी की आदतों
आपकी बहू के अक्खड़पन में भी
आप मुझे नज़र आते हो
हर रोज़ मैं अपने आप को
आपके जैसे किसी साँचे में
ढालने की हिम्मत जुटाता हूँ
कुछ देर के लिए आप बन जाता हूँ
बातें तो बहुत और भी थीं
जो बताने सुनाने की सोची थी
आप पास ही हो कहीं शायद
क्योंकि इस ख़याल से अब भी सहम जाता हूँजो तुम होतीं (Jo Tum Hoti)
अरसे से दिल कुछ भारी सा है
एक ख़याल दिमाग़ पे हावी सा है
माँ आज जो तुम दुनिया में होतीं
तो पूरे अस्सी साल की हो जातीं
तुम्हारे ना होने की आदत ही नहीं डल रही
इतनी यादें हैं तुम्हारी जो धुंधली नहीं पड़ रहीं
हर सुबह की वो नोंक-झोंक के चाय कौन बनाएगा
या इस बात पे बहस की क्या कभी देश में
राम राज्य आयेगा
कईं और भी मनसूबे किए थे जो बिखरे पड़े हैं
ख़त्म होने चलें हैं आँसू मेरे, नैनों में सूखे पड़ें हैं
इस बरस cake की मोमबत्ती नहीं तेरी याद में दिया जलेगा
वक्त को अब धीरे धीरे मेरा ये ज़ख़्म भी भरना पड़ेगा