बिछोड़ा (Bichchoda)

आज का ये कलाम
बिछड़े हुए दोस्त के नाम
संग अगर तू आज भी मेरे होता
तो ये दिल धड़कन से जुदा न होता
लिखी दोस्ती जिस कलम से, सियाही कम थी
रुके हुए हैं आँसू वहीं, आँखें तो बरसों से नम थीं
आज भी जब कहीं यारों की महफ़िल सजती है
यादों की पूर्वाइयाँ बड़ी ज़ोरों से चलने लगतीं हैं
लड़कपन की उन गलियों को फिर घूम आतें हैं
कुछ मौके साथ अपने बिछोड़े का दर्द लाते हैंFriendship Lane

They’ll most certainly lie for you,
Spin tall tales at the drop of a hat,
Man, they make ‘em sound so true,
You’d kill to have a frat like that.
Take your trip with a straight face,
Draw immense joy from your pain,
Cause a pain in every wrong place,
No misses when there’s points to gain.
Friendships made whilst still young,
Hanging together turning days to nights,
Meaning every word of the songs they sung,
They turned into men destined for heights.
Lives got lived and careers got made,
The wheel of time continued to turn,
Decades slowly rolled into the next decade,
Conversations changed from heartbreaks to heartburn.
Time reset to where they’d hit pause,
Fifty something and they met again,
Everything back to the way it was,
Those three nights at Friendship Lane!Friendship Lane

They’ll most certainly lie for you,
Spin tall tales at the drop of a hat,
Man, they make ‘em sound so true,
You’d kill to have a frat like that.
Take your trip with a straight face,
Draw immense joy from your pain,
Cause a pain in every wrong place,
No misses when there’s points to gain.
Friendships made whilst still young,
Hanging together turning days to nights,
Meaning every word of the songs they sung,
They turned into men destined for heights.
Lives got lived and careers got made,
The wheel of time continued to turn,
Decades slowly rolled into the next decade,
Conversations changed from heartbreaks to heartburn.
Time reset to where they’d hit pause,
Fifty something and they met again,
Everything back to the way it was,
Those three nights at Friendship Lane!टीस (Tees)

आज अस्सी पे पूरे एक हो जाते
एक कम पे अगर तुम रुक न जातीं
ज़िन्दगी मगर बदस्तूर आगे बढ़ रही है
बस तुम्हारा सर पे हाथ नहीं रहा माँ
तुम्हारे कमरे के आगे से जब भी मैं गुज़रता हूँ
मेरे कान तेरी आवाज़ को सुन लेते हैं
घर से निकलने से पहले एक पल को मैं अब भी ठहर लेता हूँ
बस, आजकल तुम से वो दवा के डोज़ वाली दो बातें नहीं हो पाती
मालूम है मुझे कि ये दौर सबके जीवन में आता है
इस की टीस को कोई मगर नहीं समझा पाता है
जो बीत गया वो गया जो है उसी को निभाना है
याद सदा आती है तुम्हारी जन्मदिन बस कविता का बहाना हैReflections @ 50 plus
झलक (Jhalak)

देखते देखते पूरा एक साल बीत गया
श्रृष्टि के नियमानुसार फ़िर काल जीत गया
जीवन है, लगी तो रहती ही है आनी जानी
इस ताल को वश में कर पाया नहीं कोई ज्ञानी
समय और संवेदना हृदय की पीड़ा हर नहीं पाते
कुछ रिश्ते किसी भी जतन भुलाए नहीं भुलाते
साये जो हट जातें हैं बड़ों के कभी सिर से
लाख चाहे किसी के मिल नहीं पाते फ़िर से
जीवन का चक्का तो निरंतर घूमता ही रहता है
हर पल हर दिन एक नई कहानी गढ़ देता है
पात्र बदल जातें हैं कुछ, कुछ बदले आतें हैं नज़र
मोह का भी क्या है नया बना लेता है अपना घर
दौड़ती फिरती है ये यादें मगर कुछ बेलगाम सी
बातों और आदतों में ढूँढ लेती हैं झलक उनकी
बीते दिनों के किस्सों से अपना मन भर लेता हूँ
मन हो भारी तो उनको बंद आँखों में भर लेता हूँचिट्ठी (Chitthi)

मैं ख़ुश हूँ पापा
और मुझे मालूम है
के इस बात को जान
आप कई ज़्यादा ख़ुश होते
बीते चार सालों में
कुछ पाया और
बहुत कुछ खोया है
“जीवन है”, आप यही कहते
बड़ी वाली की बातों
छोटी की आदतों
आपकी बहू के अक्खड़पन में भी
आप मुझे नज़र आते हो
हर रोज़ मैं अपने आप को
आपके जैसे किसी साँचे में
ढालने की हिम्मत जुटाता हूँ
कुछ देर के लिए आप बन जाता हूँ
बातें तो बहुत और भी थीं
जो बताने सुनाने की सोची थी
आप पास ही हो कहीं शायद
क्योंकि इस ख़याल से अब भी सहम जाता हूँजो तुम होतीं (Jo Tum Hoti)
अरसे से दिल कुछ भारी सा है
एक ख़याल दिमाग़ पे हावी सा है
माँ आज जो तुम दुनिया में होतीं
तो पूरे अस्सी साल की हो जातीं
तुम्हारे ना होने की आदत ही नहीं डल रही
इतनी यादें हैं तुम्हारी जो धुंधली नहीं पड़ रहीं
हर सुबह की वो नोंक-झोंक के चाय कौन बनाएगा
या इस बात पे बहस की क्या कभी देश में
राम राज्य आयेगा
कईं और भी मनसूबे किए थे जो बिखरे पड़े हैं
ख़त्म होने चलें हैं आँसू मेरे, नैनों में सूखे पड़ें हैं
इस बरस cake की मोमबत्ती नहीं तेरी याद में दिया जलेगा
वक्त को अब धीरे धीरे मेरा ये ज़ख़्म भी भरना पड़ेगाएहसास (ehsaas)

आज दिल में एक भारी सा एहसास है
यादों से लदी हुई हर घड़ी हर सॉस है
वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम है ऐसा कहते हैं
जाने क्यों मगर ज़िन्दगी के घाव ताज़ा ही रहते हैं
सजा के तो कई अरमान रखे थे यूँ लोगों ने
अब तो वो भी ग़ुम हो गए संजोए थे जिन्होंने
आँगन में धूप तो आज भी वही खिलती है
बारिश की बूँदे वही अटखेलियाँ करती हैं
पसंदीदा पकवानों में सिमटा उस रिश्ते का ज़ायक़ा है
बच्चों की किसी हरकत में अब होता आभास है
अकेले हो जाने का दर्द यूँ बस सम्भाला है मैने
दिल में हैं महफूज़ अज़ीज़ जहाँ रहना था उन्होंनेमाँ (Maa)

जाने कितनी दफ़ा कंधे पे तेरे सर रख के घंटों सोया हूँ मैं जाने कितनी दफ़ा तेरे आँचल तले बिलख़ के रोया हूँ मैं जाने कितनी दफ़ा मेरी छोटी सी छींक ने रात भर जगाया होगा जाने कितनी दफ़ा मेरी किसी नादानी ने तेरा दिल दुखाया होगा जाने कितनी दफ़ा मेरे भविष्य की चिंता तूने की होगी जाने कितनी दफ़ा मेरी एक पुकार पे तुम हर काम छोड़ भागी होगी जाने कितनी दफ़ा ये सोचता हूँ क्या मैंने तुम्हें गर्वान्वित होने का कभी मौक़ा दिया जाने कितनी दफ़ा ये सोचता हूँ क्या अलग करता कैसे मैंने तुम्हें यूँ अचानक खो दिया जाने कितने दफ़ा मैं ख़ुद को और लोग मुझको इसे होनी की चाल बताते हैं जाने कितनी दफ़ा यादें और ख़याल तेरे होने का एहसास दिलाते हैं जाने कितनी दफ़ा फिर दो आसूँ बहा तुम्हारा स्मरण करता हूँ जाने कितनी दफ़ा शीश झुका के माँ तेरे जीवन को नमन करता हूँ