राह (Raah)

ये राह नई है 
जिसपे की मैं चल पड़ा हूँ
इस डगर पे
कोई भी पगडंडी नहीं है

बस एक मंज़िल है
जिसे सपनों में देखता हूँ
इस रास्ते पे
कोई निशान नहीं है

रूह की आवाज़ है
जिसे मैं सुन पाता हूँ
चल पड़ा हूँ उस धुन पे
जिसकी ताल का पता नहीं है

ख़ुद पे मगर यक़ीन है
इतना मैं जानता हूँ
भरोसा है जिन पे
वो कदम किसी और के नहीं हैं

इतना तो लाज़मी है
जिस को आज मैं तराशता हूँ
कल और भी चलेंगे उस सड़क पे
बस आज उन्हें इस बात का इल्म नहीं है