टीस (Tees)

आज अस्सी पे पूरे एक हो जाते
एक कम पे अगर तुम रुक न जातीं
ज़िन्दगी मगर बदस्तूर आगे बढ़ रही है
बस तुम्हारा सर पे हाथ नहीं रहा माँ
तुम्हारे कमरे के आगे से जब भी मैं गुज़रता हूँ
मेरे कान तेरी आवाज़ को सुन लेते हैं
घर से निकलने से पहले एक पल को मैं अब भी ठहर लेता हूँ
बस, आजकल तुम से वो दवा के डोज़ वाली दो बातें नहीं हो पाती
मालूम है मुझे कि ये दौर सबके जीवन में आता है
इस की टीस को कोई मगर नहीं समझा पाता है
जो बीत गया वो गया जो है उसी को निभाना है
याद सदा आती है तुम्हारी जन्मदिन बस कविता का बहाना है