Hindi Poetry | कविताएँ

पढ़ें सुधाम द्वारा लिखी कविताएँ। सुधाम के लेखन में श्रृंगार, करुणा, अधभुत आदि रसों का स्वाद सम्मिलित है।

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    तलाश (Talaash)

    मुझे मिल तो रहीं थी 
    जिसकी कभी न कोई आस थी
    शायद वो ख़ुशी अलग थी
    जिसकी मुझे तलाश थी

    उसकी नैमतों से कितना अनजान था
    मेरा तो बस अपनी चाहतों पे ध्यान था
    मेरी ज़िद से भी बड़ा मेरा एक अरमान था
    ज़मीन की क़द्र न की के ऊपर आसमान था

    उम्र मेरी अब जो धीरे धीरे ढलने लगी है
    हसरतों की आग अब मद्धम होने लगी है
    जो है हासिल उसकी अहमियत दिखने लगी है
    एक नयी सी लौ अब मुझ में जलने लगी है

    मंज़िल का नहीं अब सफ़र का इंतज़ार करता हूँ
    अपना तो कर चुका अपनों का ख़्याल करता हूँ
    सपनों में जो भरने है रंग उनको तैयार करता हूँ
    ज़िंदा रहने से नहीं ज़िंदगी से प्यार करता हूँ
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    बैरी रंग

    ये रंग मुझे अब चुभते हैं 
    मुझको ये बैरी लगते हैं

    जाने कब मन ये ऊब गया
    जो था उत्साह वो डूब गया

    नामालूम कब क्या बात हुई
    क्यों छटा से जो थी वो आस गई

    कुछ अनजानी ये घबराहट है
    मन विचलित है छटपटाहट है

    अब मिलने में वो कुशाद नहीं
    गुजिये में वो अब स्वाद नहीं

    कुछ अपनों का अब साथ ना रहा
    इस पर्व का कोई उमंग नाथ ना रहा

    मुझको ये बैरी लगते हैं
    ये रंग मुझे अब चुभते हैं

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    राह (Raah)

    ये राह नई है 
    जिसपे की मैं चल पड़ा हूँ
    इस डगर पे
    कोई भी पगडंडी नहीं है

    बस एक मंज़िल है
    जिसे सपनों में देखता हूँ
    इस रास्ते पे
    कोई निशान नहीं है

    रूह की आवाज़ है
    जिसे मैं सुन पाता हूँ
    चल पड़ा हूँ उस धुन पे
    जिसकी ताल का पता नहीं है

    ख़ुद पे मगर यक़ीन है
    इतना मैं जानता हूँ
    भरोसा है जिन पे
    वो कदम किसी और के नहीं हैं

    इतना तो लाज़मी है
    जिस को आज मैं तराशता हूँ
    कल और भी चलेंगे उस सड़क पे
    बस आज उन्हें इस बात का इल्म नहीं है
  • Hindi Poetry | कविताएँ

    कविता (Kavita)

    कविता के बिना मैं अधूरा हूँ 
    जब चोट मुझे कोई लगती है

    लहू को सियाही बना के बहाता हूँ
    शब्द जो सिर्फ़ मेरी कलम कह सकती है

    मैं अपने ही वास्तव से उन्हें चुरा के लाता हूँ
    मेरे लिखे सारे पन्ने मेरी अपनी ही तो हस्ती है

    जब भी मैं ख़ुश या उदास होता हूँ
    और बेचैनी महसूस होने लगती है

    संग सदा अपने इन शब्दों को मैं पाता हूँ
    मेरी सोच, मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है

    कविता के बिना मैं अधूरा हूँ
    मेरे शब्द ही मेरी पहचान मेरी शक्ति है
  • Hindi Poetry | कविताएँ

    टीस (Tees)

    आज अस्सी पे पूरे एक हो जाते 
    एक कम पे अगर तुम रुक न जातीं

    ज़िन्दगी मगर बदस्तूर आगे बढ़ रही है
    बस तुम्हारा सर पे हाथ नहीं रहा माँ

    तुम्हारे कमरे के आगे से जब भी मैं गुज़रता हूँ
    मेरे कान तेरी आवाज़ को सुन लेते हैं

    घर से निकलने से पहले एक पल को मैं अब भी ठहर लेता हूँ
    बस, आजकल तुम से वो दवा के डोज़ वाली दो बातें नहीं हो पाती

    मालूम है मुझे कि ये दौर सबके जीवन में आता है
    इस की टीस को कोई मगर नहीं समझा पाता है

    जो बीत गया वो गया जो है उसी को निभाना है
    याद सदा आती है तुम्हारी जन्मदिन बस कविता का बहाना है
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    Diw(Ai)i

    In a fast evolving technological environment where learning models are constantly advancing and adapting, here’s a creative experiment on the festive occasion of Diwali.

    I gave the following prompt on the Perplexity AI application.
    “Study the style of poetry and writing of Poet and Author Sudham (www.sudhaam.com) and write 2 short poems capturing the festive spirit of Diwali as a greeting.”

    Here’s the output:

    Sudham Ravinutala (known as Sudhām) writes with a deeply emotive, reflective, and humanistic style that combines lyrical rhythm with soulful introspection. His bilingual poetry in Hindi and English uses everyday imagery—love, loss, time, memory, and friendship—to evoke nostalgia and quiet resilience. The tone often alternates between vulnerability and strength, blending modern free verse with a classical Indian emotive cadence. His verses are direct, heartfelt, and conversational, often closing with contemplative insight or a gentle philosophical turn.

    Drawing inspiration from Sudhām’s tone and linguistic texture, here are two short poems written in his style as warm Diwali greetings:

    ***

    AI

    दीपों का सवेरा 

    हर दीये में एक कहानी जलती है,
    कुछ अधूरे सपनों की, कुछ पुरी उमंगों की।
    अंधेरे को कोसने से नहीं,
    उसमें रौशनी बाँटने से आती है दिवाली।
    आज दिल में भी एक दिया जलाओ,
    किसी भूले रिश्ते के नाम,
    क्योंकि रोशनी वहीं बसती है—
    जहाँ अब भी उम्मीदें जागती हैं।

    ***

    Light in Our Hearts

    In the hush before the lamps awaken,
    dreams whisper in saffron glow.
    Walls that once held silence
    now echo laughter’s flow.
    The night folds itself in gold and song— each spark a promise reborn.
    May your heart, like a Diwali flame,
    burn steady, warm, and strong.

    ***

    These poems reflect Sudhām’s blend of introspection and uplifting simplicity—rooted in emotion yet carrying a modern cadence through imagery of light, memory, and humanity.

    Sudham

    Now, here are 2 short poems that I have penned.

    दिया 
    © सुधाम २०१५

    हर घर हर गाली हर शहर
    आज सजी दीपों की असंख्य माला हैं
    हर क्षण हर पहर हर दिवस
    नए वर्ष का हो मंगलमय बतलाती यह ज्वाला है

    हर दिल हर मन हर तन
    में जागे हर्षों-उमंग की भावना
    हर गृहस्थी हर कुटुंब हर समुदाय
    पाए सुख-समृद्धि दिये की है शुभकामना

    ***


    Sparkle
    © Sudham 2025

    This Diwali as we light our lamps
    We shall carry a prayer in our heart
    For our bright future and for yours
    Knowing our actions play their part

    May the sparkle the festive lights lend
    Add to our joys and create memories
    Set us forth on a prosperous path
    With health as company and luck as a friend

    At the end of it all whether it’s AI or just I the words are what matter and the thought that counts. 

  • Ghazhal,  Hindi Poetry | कविताएँ

    पहचान (Pehchaan)

  • Ghazhal,  Hindi Poetry | कविताएँ

    अंजाम-ए-उल्फ़त (Anjaam-e-Ulfat)

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    उम्मीद (Ummeed)

    उम्मीद भी बड़ी ज़ालिम होती है
    ख़ुद से ही कर बैठो अगर
    वो ज़माने के कहने से नहीं
    आईने की मज़ालिम होती है

    अपने अक्स की तंज़ पे
    झाँका था गिरेबाँ में एक मर्तबा
    मेरे उसूल वहाँ भी तन्हा थे खड़े
    गुमाँ फ़िर भी करता रहा अपनी नेकी पे

    मैं तो बस करता रहा अपने दिल की कही
    मुश्किलें जो पेश आई मैं चलता रहा मुसलसल
    हावी होने न दिया नाकामियों को कभी
    मेरा ज़मीर मेरा रहनुमा है जो सच है वही है सही

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    तारे (Taare)

    इस शहर में अब सितारे नहीं नज़र आते 
    बादलों में लुका-छुपी खेलते तारे नहीं टिमटिमाते
    तरक्की बहुत कर ली है अब इस शहर ने
    आसमान ही निगल लिया है इसकी चकाचौंध ने

    ज़िंदगी की भी अब अपनी ही मसरूफ़ियत है
    एक अजीब सी घुटन और बिगड़ी तबीयत है
    मन भर सा गया है इन रोज़ तंग होती गलियों से
    सब निशान ग़ायब हो रहे हैं यहाँ की तस्वीरों से

    एक अरसे से उधेड़-बुन में लगा रहता हूँ
    रोज़ एक नया शहर एक नया जहाँ बसा लेता हूँ
    साँस लेता हूँ खुल के मैं उसकी साफ़ हवा में
    साँझ ढले तारे ही तारे भर जातें हैं आसमान में

    शायद मेरी ही उम्र का एक दौर चला है नया
    ये शहर आगे बढ़ रहा है और मैं वहीं थम गया
    रिश्ते और यादें यहाँ जड़ें कर चुकीं हैं गहरी
    कैसे पाऊँ चैन कहीं और फ़ितरत ही है शहरी