कल (Kal)

चलो अच्छा है के पहल तो हुई
ज़रा देर लगी बात आगे बढ़ाने में
कुछ समय बीता रूठने मनाने में
लंबी अँधेरी रात की सहर तो हुई

आँधी सा उठा था जो वो बदलाव लेके आया है
संग हैं उस के कई वादे और कुछ चुनौतियाँ भी
उमंगों-जोश के साथ ज़रूरी है सयंम और होश भी
दिन नया एक नए दौर का संदेश लेके आया है

आसान नहीं होगा सब कुछ बदल पाना
व्यवस्था और तंत्र के पहिये धीमे घूमते हैं
हम-आप जैसे लोग ही इस के ताने को बुनते हैं
गहरे घाव हों तो मुश्किल है निशान मिटा पाना

निकल पड़ें हैं इस राह पे अब तो घबराना कैसा
बुलंद हौंसलों में अब कोई कमी न आने पाए
इरादे जो हैं मज़बूत उनमें नमी न आने पाए
अब डोर है हाथे में, देखें कल का भारत बने कैसा